विपत्ति कसौटी जे कसे ते ही साँचे मीत पर निबंध | Vipatti Kasauti Je Kase Soi Sache Meet

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विपत्ति कसौटी जे कसे ते ही साँचे मीत पर निबंध | Vipatti Kasauti Je Kase Soi Sache Meet

‘एकाकी बादल रो देते, एकाकी रवि जलता रहता’

सच्चे मित्र की आवश्यकता

जीवन का एकाकीपन वास्तव में एक अभिशाप है। सामाजिक प्राणी होने के नाते प्रत्येक मनुष्य अपने विचारों के आदान-प्रदान, अपने सुख-दुख बाँटने तथा अनेक कार्यों में सहयोग लेने के लिए किसी साथी की आवश्यकता पड़ती है। यद्यपि उसके परिवार में माता-पिता, भाई-बहन आदि अनेक व्यक्ति होते हैं, परंतु इनके अतिरिक्त उसे एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता पड़ती है जिससे वह दिल खोलकर बातें कर सके। परिवार के सदस्यों से हर बात नहीं की जा सकती। यदि किसी से दिल खोलकर बातें की जा सकती हैं, तो केवल मित्र से।

मित्र के अभाव में मनुष्य कुछ खोया खोया सा रहता है, क्योंकि वह अपने सुख-दुख की बात किससे करे, विपरित के समय किससे सहायता माँगे, हँसी-मजाक किससे करे, किसी समस्या का हल किससे पूछे तथा अपना समय किसके साथ बिताए?

ईश्वर का वरदान

सच्चे मित्र का मिलना सरल नहीं होता। सच्चा मित्र ईश्वर का सबसे प्रिय वरदान है। मित्रता संसार की सबसे बड़ी नियामत है। सच्चा मित्र वही है, जो विश्वासपात्र तथा सदाचारी हो। जो आवश्यकता पड़ने पर काम आए, वही सच्चा मित्र होता है। तुलसीदास ने अपने ग्रंथ रामचरितमानस में मित्र के लक्षण बताते हुए कहा है कि सच्चा मित्र वही है जो अपने मित्र के दुख से दुखी हो, अपने बड़े से बड़े दुख को धूल-कण के समान और मित्र के धूल-कण के समान दुख को बड़ा समझे, मित्र को बुरे मार्ग से रोककर अच्छे मार्ग पर चलाए, मित्र के गुणों को प्रकट करे और उसके अवगुणों को छिपारा विपत्ति के समय सौ गुना स्नेह करे, लेन-देन में मन में शंका न रखे और अपनी शक्ति के अनुसार सदा हित ही करता रहे। जो सामने कोमल वचन बोले और पीछे अहित करे, मन में कुटिलता रखे-ऐसे मनुष्य को मित्र नहीं बनाना चाहिए।

सच्चे मित्र के गुण

सच्ची मित्रता मछली और पानी जैसी होनी चाहिए। तालाब में जब तक जल रहा, मछलियाँ भी प्रसन्न रहीं, परंतु जब पानी पर विपत्ति आई और वह समाप्त होने लगा तो मछलियाँ भी उदास रहने लगीं। पानी के समाप्त होने पर मछलियों ने भी अपने प्राण त्याग दिए। मित्रता दूध और जल की सी नहीं होनी चाहिए। जब दूध पर विपत्ति आई तो पानी तो भाप बनकर उड़ गया और अकेला दूध जलने लगा। जब मनुष्य पर विपत्ति आती है तो उसी समय सच्चे मित्र की पहचान भी होती है। स्वार्थवश की गई मित्रता संकट के समय समाप्त हो जाती है। तुलसीदास जी ने सच्चे मित्र के बारे में कहा है —

‘धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी, आपतकाल परखिए चारी’

विपत्ति में पहचान

सच्चे मित्र की पहचान आपत्ति के समय ही होती है। जब व्यक्ति पास धन-दौलत, वैभव आदि होता है, तो सभी लोग उससे मित्रता करने को लालायित रहते हैं परंतु जैसी ही उस पर गरीबी के बादल मंडराने लगते हैं, मित्र किनारा कर लेते हैं —

बन जाते हैं बहुत दोस्त, जब जर पास होता है।
बिगड़ जाता है गरीबी में, जो रिश्ता खास होता है।।

मित्रता के अनेक उदाहरण

सच्ची मित्रता के अनेक उदाहरण मिलते हैं। महाभारत में श्रीकृष्ण ने कर्ण से प्रस्ताव किया कि यदि तुम दुर्योधन का साथ छोड़ दोगे, तो पाण्डव तुम्हारा अभिषेक करेंगे, तुम्हारी आज्ञा मानेंगे, तुम महान सम्राट होने का गौरव प्राप्त करोगे तथा महाभारत का भीषण युद्ध भी रुक जाएगा। यह जानते हुए भी कि वह कुंती का पुत्र है तथा पांडव उसके भाई हैं, कर्ण ने दुर्योधन की मित्रता छोड़ना स्वीकार नहीं किया, क्योंकि अपमान की घड़ी में दुर्योधन ने उसका हाथ थामा था। उसने श्रीकृष्ण से कहा —

मित्रता बड़ा अनमोल रतन। कब इसे तोल सकता है धन।।
सुरपुर की तो है क्या बिसात। मिल जाए अगर बैकुंठ हाथ।।
कुरुपति के चरणों में धर दूं। दुर्योधन अर्पित कर दूँ॥

सच्ची मित्रता का इससे अच्छा उदाहरण और क्या हो सकता है। कृष्ण-सुदामा की मित्रता का उदाहरण भी दिया जाता है, परंतु आज के युग में तो ऐसे मित्र की कल्पना मात्र की जा सकती है, क्योंकि आजकल मित्रता किसी-न-किसी स्वार्थ से प्रेरित होकर की जाती है। स्वार्थ की पूर्ति होने पर मित्रता भी समाप्त हो जाती है-‘स्वारथ लागि करै सब प्रीति’। आज के अधिकांश मित्र सामने मीठा बोलते हैं और पीछे काम बिगाड़ते हैं। ऐसे मित्र विष के भरे हुए उस घट के समान होते हैं जिसके मुँह पर दूध लगा दिया गया हो। ऐसे मित्र को त्याग देने में ही भलाई है।

सच्ची मित्रता दैवी देन है और मनुष्य के लिए बहुमूल्य वरदान है। वह जीवन की अमूल्य निधि है तथा सुख दुख का साथी है। विपत्ति की कसौटी पर जो खरा उतरे, वहीं सच्चा मित्र कहलाने के योग्य होता है —

कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत।
विपति कसौटी जे कसे, ते ही साँचे मीत ।।

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