उपसर्ग (Upsarg) की परिभाषा, भेद और उदाहरण

इस लेख में हम आपको उपसर्ग की परिभासा (upsarg ki paribhasa) (Upsarg kise kahate hain), उपसर्ग के भेद (upsarg ke bhed) और upsarg के उदाहरण के बारे में बताने वाले हैं। इस Article में उपसर्ग के बारे में पूरी जानकारी दी गई है। इसको ध्यान से पढे।

उपसर्ग की परिभासा (upsarg ki paribhasa) (Upsarg kise kahate hain), उपसर्ग के भेद (upsarg ke bhed) और upsarg के उदाहरण

उपसर्ग किसे कहते हैं? (Upsarg)

‘उपसर्ग’ भाषा के वे सार्थक लघुतम खंड हैं, जो शब्द के आरंभ में लगकर नए-नए शब्दों का निर्माण करते हैं।

जैसे —

  • अन् + आदर = अनादर
  • दुर् + दिन = दुर्दिन
  • बे + ईमान = बेईमान
  • वि + नाश = विनाश
  • सु + योग = सुयोग
  • प्र + हार = प्रहार

हिंदी में तीन प्रकार के शब्द मिलते हैं : तत्सम, तद्भव तथा अन्य भाषाओं से आगत विदेशी शब्द। इन तीनों कोटियों के शब्दों में मूल शब्द भी हैं; जैसे — कर्म (तत्सम), काम (तद्भव) तथा ईमान, रेल (विदेशी) तथा यौगिक या व्युत्पन्न शब्द भी जो मूल शब्दों में उपसर्ग या प्रत्यय जोड़कर बनाए जाते हैं। इस दृष्टि से हिंदी में तीनों ही प्रकार के उपसर्ग प्राप्त होते हैं।

1. तत्सम उपसर्ग — तत्सम उपसर्ग वे उपसर्ग हैं, जो संस्कृत से हिंदी में आ गए हैं। संस्कृत में बाईस उपसर्ग हैं। इन उपसर्गों से बने अनेक शब्द हमें हिंदी में मिलते हैं। कुछ शब्दों के उदाहरण नीचे दिए जा रहे हैं :

उपसर्ग अर्थ उदाहरण
अति अधिक अत्यंत, अत्याचार, अतिरिक्त, अतिक्रमण, अतिशय, अत्युत्तम, अत्यधिक।
अधि ऊपर, श्रेष्ठ अधिकार, अधिनायक, अधिकरण, अध्यादेश, अध्यक्ष, अधिशुल्क, अध्ययन, अधिपति ।
अनु पीछे, समान, बाद में आने वाला अनुभव, अनुभूति, अनुकरण, अनुरोध, अनुशासन, अनुवाद, अनुरूप, अनुसार, अनुकंपा, अनुराग, अनुकूल, अनुगामी, अनुचर, अनुमान, अनुज।
अप बुरा, हीन अपयश, अपमान, अपव्यय, अपशब्द, अपकार, अपहरण, अपवाद, अपशकुन, अपकीर्ति।
अभि सामने, ओर अभिनय, अभिमुख, अभिज्ञान, अभिमान, अभ्यास, अभियोग, अभिनव, अभिलाषा, अभिशाप, अभ्यागत, अभियान।
अव बुरा, हीन, उप अवसान, अवसर, अवकाश, अवनति, अवगुण, अवशेष, अवतरण, अवतार, अवज्ञा।
तक, समेत आहार, आक्रमण, आजीवन, आजन्म, आकर्षण, आगमन, आमरण, आदान, आरक्षण।
उछ् (उत्) ऊपर, श्रेष्ठ उत्थान, उद्गम, उन्नति, उद्योग, उच्चारण, उल्लंघन, उद्देश्य, उत्तम, उद्घाटन, उत्कर्ष ।

संस्कृत में कुछ शब्द या शब्दांश जो प्रायः समास रचना के पहले भाग में आते थे, इतने अधिक प्रचलित हो गए कि उनका प्रयोग हिंदी में उपसर्गों की भाँति होने लगा है; जैसे

उपसर्ग अर्थ उदाहरण
निषेध अज्ञान, अभाव, अहिंसा, असुंदर, अधर्म, अकाल, अनुचित, अनेक, अनादि, असाध्य।
कु बुरा कुकर्म, कुयोग, कुपुत्र, कुरूप, कुपात्र, कुमति, कुख्यात, कुकृत्य।
सु अच्छा सुपुत्र, सुपात्र, सुकर्म, सुफल, सुमति।
सत् अच्छा सत्पुरुष, सत्कर्म, सद्गति, सदाचार, सज्जन, सत्संग, सद्भावना।
स/सा साथ/ सहित सादर, साग्रह, सायास
पुनर् / पुनः फिर पुनर्जन्म, पुनर्विवाह, पुनर्कथन, पुनरुत्थान, पुनरुक्ति, पुनरुद्धार, पुनर्निर्माण, पुनर्जागरण।
अधः नीच अधोपतन, अधोगति, अधोमुखी, अध:स्थल।

2. तद्भव उपसर्ग — तद्भव उपसर्ग मूलत: संस्कृत के (तत्सम) उपसर्गों से ही विकसित हुए हैं। इन्हीं को हिंदी उपसर्ग भी कहा गया है। कुछ प्रमुख तद्भव उपसर्ग इस प्रकार हैं :

उपसर्ग अर्थ उदाहरण
अ/अन अभाव, निषेध अनपढ़, अनजान, अनहोनी, अनबोल, अछूत, अथाह, अनबन, अचेत, अनमोल।
उन काम उनचास, उनसठ, उनहत्तर, उनतालीस। औ हीन
हीन औगुन, औघट, औतार।
क/कु बुरा कपूत, कुचाल, कुढंग, कुसंगति।
नि रहित संस्कृत ‘निर्’ से विकसित हुआ है तथा रहित’ के अर्थ में प्रयुक्त होता है; जैसे-निहत्था, निकम्मा, निडर।

3. आगत (विदेशी) उपसर्ग — जो उपसर्ग विदेशी भाषाओं से हिंदी में आ गए हैं :

उपसर्ग अर्थ उदाहरण
‘के साथ’, ‘से’ बखूबी, बदौलत, बगैर, बनाम।
बा ‘साथ’, ‘से’ बाकायदा, बाअदब, बावजूद।
बे ‘बिना’ बेअदब, बेरहम, बेगुनाह, बेचैन, बेईमान, बेवफ़ा, बेखटके, बेघर, बेहोश, बेसमझ।
बद बुरा बदनाम, बदमाश, बदतमीज, बदचलन, बदकिस्मत, बदबू, बदसूरत, बदहज़मी।
खुश अच्छा खुशबू, खुशकिस्मत, खुशहाल, खुशनसीब, खुशमिज़ाज, खुशदिल।

उपसर्गों के आधार पर शब्द-निर्माण के कुछ प्रमुख बिंदु

उपसर्ग लगाकर शब्द-निर्माण करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए :

  • प्रायः जिस प्रकार का शब्द है, उसी प्रकार का उपसर्ग उस शब्द के साथ लगता है; अर्थात् तत्सम शब्द के साथ तत्सम उपसर्ग, तद्भव शब्द के साथ तद्भव उपसर्ग तथा विदेशी शब्द के साथ विदेशी उपसर्ग; जैसे–’सु’ तत्सम उपसर्ग है, यह तत्सम शब्द ‘पुत्र’ के साथ लगकर ‘सुपुत्र’ शब्द बनाता है पर ‘पूत’ (तद्भव) के साथ ‘सुपूत’ नहीं।
  • कभी-कभी जब कुछ उपसर्ग भाषा में बहुप्रचलित हो जाते हैं या कभी-कभी साहित्यकार नए-नए प्रयोग करने लगते हैं, तब भिन्न स्रोत के उपसर्ग, भिन्न स्रोत के शब्दों के साथ भी प्रयुक्त हो जाते हैं; जैसे-बेजोड़, अथाह आदि।
  • संस्कृत के निषेधवाची ‘अन्’ उपसर्ग का रूप हिंदी में ‘अन’ के रूप में परिवर्तित हो जाता है; जैसे-अनदेखा, अनजाना, अनकहा, अनसुनी आदि।
  • तत्सम उपसर्गों में कुछ उपसर्ग ऐसे भी हैं जिनके एक से अधिक रूप भी मिलते हैं; जैसे-दुर्, दुस्, दुष्, दुश् आदि जो निम्नलिखित विवरण के अनुसार ही लगते हैं :

दुर् — दुर्लभ, दुर्गुण, दुर्बोध   (सघोष ध्वनियों से बनने वाले शब्दों में)
दुस् — दुस्साहस, दुस्साध्य, दुस्तर   (स, त अघोष ध्वनियों के पूर्व)
दुष् — दुष्कर, दुष्कर्म, दुष्प्राप्य (क, प आदि अघोष ध्वनियों के पूर्व)
दुश् — दुश्चरित्र, दुश्चिता (च आदि ध्वनियों के पूर्व)

इसी प्रकार निर्, निस्, निष्, निश् रूपों के प्रयोग भी मिलते हैं।

  • एक उपसर्ग एक से अधिक अर्थों में भी प्रयुक्त हो सकता है।
  • उपसर्गों से जो नए-नए शब्द बनते हैं उनमें कभी तो नए शब्द की व्याकरणिक कोटि वही रहती है, जो मूल शब्द की है और कभी उसकी व्याकरणिक कोटि बदल जाती है; जैसे —

व्याकरणिक कोटि में परिवर्तन :

  • अ + थाह → अथाह   (संज्ञा) (विशेषण)
  • अन + पढ़ → अनपढ़   (क्रिया) (विशेषण)
  • नि + डर → निडर   (संज्ञा) (विशेषण)
  • अन + बन → अनबन   (क्रिया) (विशेषण)

व्याकरणिक कोटि में परिवर्तन नहीं:

  • अन + होनी → अनहोनी   (संज्ञा) (संज्ञा)
  • अन् + आवश्यक → अनावश्यक  (विशेषण) (विशेषण)
  • गैर + ज़िम्मेदारी → गैरजिम्मेदारी  (संज्ञा) (संज्ञा)

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