नर हो न निराश करो मन को पर निबंध | Nar Ho Na Nirash Karo Man Ko

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नर हो न निराश करो मन को पर निबंध | Nar Ho Na Nirash Karo Man Ko

प्रस्तावना

मानव ने अपनी बौद्धिक क्षमता तथा मानसिक शक्ति के बल पर अनेक प्रकार की उपलब्धियाँ प्राप्त करके यह सिद्ध कर दिया है कि सृष्टि के समस्त चराचरों में केवल वही सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। मनुष्य ने अपनी बुद्धि तथा अन्य क्षमताओं का प्रयोग करके सागर का वक्षस्थल चीर कर उसके रहस्यों का पता लगा लिया है, पर्वत-शिखरों पर अपनी विजय पताका फहरा दी है, नदियों का रुख मोड़ डाला है, अंतरिक्ष की ऊँचाइयों को छू लिया है, पृथ्वी के गर्भ से अनेक प्रकार की खनिज संपदा निकाल ली है, अनेक असाध्य बीमारियों पर काबू पा लिया है, अनेक वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा असंभव को भी संभव बना दिया है। मानव उचितानुचित, कर्तव्याकर्तव्य, धर्माधर्म, भले-बुरे के बारे में सोचकर उचित निर्णय करने की अद्भुत क्षमता रखता है, क्योंकि उसमें दृढ़ता, कर्मठता, स्वावलंबन, साहस, कष्ट सहिष्णुता, धैर्य आदि गुण विद्यमान हैं।

निराश होने से हानियाँलक्ष्य अवरुद्ध

भानव में संघर्ष करने की क्षमता होते हुए भी संघर्ष करते-करते कभी-कभी वह निराश और हताश हो जाता है। परिस्थितियाँ उसे चुनौती देती हैं जिन्हें वह स्वीकार नहीं कर पाता। ऐसी स्थिति में वह सफलता प्राप्त करने से वंचित रह जाता है। कभी-कभी वह भाग्यवादी बनकर निराशा के गर्त में गिरता है और स्वयं को भाग्य के हाथों में छोड़ देता है, निराशा उसके पुरुषार्थ को कुंठित कर देती है। ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं जब निराशा ने मानव को दुर्बल बनाया। द्वितीय विश्व युद्ध में पराजय का सामना करने के बाद इंग्लैंड आदि देश निराश होकर अपनी पराजय को भाग्य की देन मानकर चुपचाप बैठ जाते, तो सदा के लिए अपमान एवं पराधीनता के अभिशापों को भोगने पर विवश हो जाते। यदि जापान अपने दो प्रमुख नगरों पर परमाणु बम गिराए जाने को किस्मत का खेल मानकर चुपचाप सहन कर लेता तो वह सदा के लिए समाप्त हो जाता। छोटे से जापान के निवासियों के जीवट, कर्मठता तथा आत्मविश्वास की जितनी प्रशंसा की जाए, उतनी थोड़ी है। उन्होंने यह दिखा दिया कि यदि मनुष्य सोच-समझकर, योजनाबद्ध तरीके से परिश्रम करे, तो सफलता उससे दूर नहीं रह सकती।

उत्साह एवं आत्मविश्वास – मानव के सच्चे गुण

‘नर हो न निराश करो मन को’ पंक्ति मानव को यही प्रेरणा देती है कि तुम मनुष्य हो, केवल तुम ही कर्मशील, बुद्धिमान तथा चिंतनशील प्राणी हो। जीवन में सफलता-असफलता, लाभ-हानि, जय-पराजय, आशा-निराशा तो धूप-छाँव की तरह आती-जाती रहती हैं। यदि एक बार लक्ष्य प्राप्ति में असमर्थ हो गए हो तो थककर बैठने से काम थोड़े ही चलेगा। निराश या हताश होकर बैठ जाना मानव की क्षमताओं, योग्यताओं तथा आत्मविश्वास का अपमान है। निराशा मानव का गुण नहीं है। मानव का गुण है — उत्साह एवं आत्मविश्वास।

विश्व में अनेक उदाहरण

सदियों का इतिहास यह सिद्ध करता है कि जब भी मनुष्य निराश होकर बैठ गया, उसकी प्रगति एवं विकास की गति अवरुद्ध हो गई, परंतु जब भी उसने अपनी हार, पराजय और असफलता को अपने लिए चुनौती मानकर दुगुने उत्साह एवं वीरता से प्रयास किया, तब उसने जो कुछ चाहा, वही प्राप्त किया। अपने देश के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास को ही लें, तो यह भली-भाँति सिद्ध हो जाता है कि अपने लक्ष्य के प्रति आशावादी दृष्टिकोण निश्चय ही सफलता का द्योतक होता है। अंग्रेजों के दमन चक्र ने भारतवासियों के उत्साह को अवरुद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। एक ओर यह निहत्थे भारतीय और दूसरी ओर थी विशाल अंग्रेजी साम्राज्यवादी शक्तियाँ, परंतु गांधी जी की ललकार पर भारतीयों ने हिम्मत नहीं छोड़ी, वे निराश होकर नहीं बैठे और स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए अनेक यातनाओं को सहते हुए भी अपने मार्ग से विचलित नहीं हुए। परिणामतः साम्राज्यवादी शक्तियों की हार हुई और हमारी जीत ।

उपसंहार

मनुष्य के लिए संसार में कुछ भी असंभव नहीं है। मनुष्य का कर्तव्य है कि वह सफलता, असफलता की परवाह किए बिना अपने लक्ष्य को पाने के लिए आत्मविश्वास और कर्मठता से अपना कर्म करता रहे । सच्चा मनुष्य वही है, जो विपत्तियों में अपना धैर्य न छोड़े और अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर रहे।

देख उत्ताल तरंगों को कर्मरत कब घबराता है।
शक्ति कुंभज-सी धारण कर पयोनिधि को पी जाता है।

मानव को चाहिए कि निराशा और उदासी को अपने पास न फटकने दे और कर्मशील बनकर अपने ‘मानव’ नाम को सार्थक बनाए तथा अपने नाम पर निराशा का कलंक न लगने दे।

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