मेरे सपनों का विद्यालय पर निबंध | Mere Sapno ki Pathshala Essay

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मेरे सपनों का विद्यालय पर निबंध | Mere Sapno ki Pathshala Essay

महर्षि अरविंद ने कहा है — ‘आचार्य राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली होते हैं। वे संस्कार की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से उन्हें सींच-सींचकर महाप्राण शक्तियों का निर्माण करते हैं।’ परंतु जब कभी मैं देश की भावी पीढ़ी के भविष्य के बारे में सोचता हूँ, मनन करता हूँ या कल्पना करता हूँ तो मन निराशा के गर्त में डूब जाता है तथा मन सोचने पर विवश हो जाता है कि वे कौन-से कारण हैं जिन्होंने आज के विद्यार्थी वर्ग को अकर्मण्य, उद्दण्ड, अनुशासनहीन तथा संस्कारविहीन बना दिया है। रह-रहकर मेरे मन में एक विचार आता है कि क्यों न मैं इस दिशा में कुछ करूँ।

सर्वप्रथम प्रश्न यह उठता है कि विद्यार्थियों की शिक्षा का आधार क्या है? निस्संदेह उनकी शिक्षा का आधार उनके विद्यालय हैं, जहाँ उन्हें अनेक विषयों की शिक्षा तो प्राप्त होती ही है, उनके जीवन का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण समय भी व्यतीत होता है। विद्यालयी परिवेश में ही उनमें नैतिक मूल्यों, रचनात्मक गुणों, स्वस्थ परम्पराओं, श्रेष्ठ संस्कारों, उच्च आदर्शों, राष्ट्रीय भावनाओं तथा भारतीय संस्कृति के प्रति प्रेम तथा देशभक्ति के भावों का बीजारोपण किया जाता है। पर इसकी सफलता विद्यालय तथा विद्यालय के आचार्यों पर निर्भर करती है। विद्यालय के स्वस्थ वातावरण तथा उसके आचार्यों की निष्ठा के द्वारा ही देश की भावी पीढ़ी को संस्कारित किया जा सकता है।

जब मैं आज के विद्यालयों की ओर दृष्टिपात करता हूँ, तो मन अवसाद से भर जाता है, चिंता की रेखाएँ उभर आती हैं तथा मन आक्रोश से भर जाता है। आज के विद्यालय केवल पुस्तकीय ज्ञान देने वाले केंद्र बनकर रह गए हैं, जहाँ किसी कार्यालय की भाँति विभिन्न आचार्य अपने-अपने कालांशों (Periods) में अपने-अपने विषयों पर लेक्चर दे जाते हैं तथा थोड़ा-बहुत गृहकार्य देकर ही अपने कर्तव्यों की इति-श्री मान लेते हैं।

मैंने अपने कल्पना-लोक में एक ऐसे आदर्श विद्यालय की कल्पना की है, जो भारत की प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं तथा वर्तमान युग की चुनौतियों-दोनों को अपनाएगा। इस विद्यालय की पृष्ठभूमि भारतीय संस्कृति के उच्चादर्शों पर आधारित होगी, जबकि इसमें विद्यार्थी को इक्कीसवीं सदी के लिए भी तैयार किया जाएगा।

यह विद्यालय नगरों की भीड़-भाड़ से दूर प्रकृति की गोद में स्थित होगा, जहाँ न तो किसी प्रकार का शोर-शराबा होगा तथा न ही किसी प्रकार का प्रदूषण! प्रकृति के मुक्त वातावरण में स्थित यह विद्यालय देश के अन्य विद्यालयों से अनेक बातों में भिन्न होगा। सबसे पहली बात तो यह होगी कि विद्यालय के आचार्यों का चुनाव अत्यंत सावधानी से किया जाएगा। इसमें कार्य करने के लिए केवल उन्हीं आचार्यों का चयन किया जाएगा जिनके जीवन का उद्देश्य ही ‘शिक्षा देना’ तथा ‘देश की भावी-पीढ़ी को संस्कारित करना होगा। यह ठीक है कि ऐसे आचार्यों का मिलना अत्यंत कठिन है, पर ‘जहाँ चाह वहाँ राह’। ‘जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ’ के आधार पर खोजने से ऐसे आचार्य मिल ही जाएँगे।

मेरे सपनों का विद्यालय प्रात:काल से सायंकाल तक का होगा। विद्यार्थियों को किसी भी प्रकार का गृहकार्य नहीं दिया जाएगा। यह सारा कार्य विद्यालय में ही पूरा करवाया जाएगा। विद्यालय में खेदकूद आदि की समुचित व्यवस्था होगी तथा विद्यार्थियों के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। मेरा उद्देश्य यह होगा कि विद्यार्थी जीवन के इस प्रारंभिक चरण में भावी जीवन की मजबूत आधारशिला बन जाए। विद्यालय में विभिन्न खेलकूदों के विशेषज्ञों के निर्देशन में खेलकूद में निपुण छात्रों की प्रतिभा प्रस्फुटित की जाएगी तथा हृष्ट-पुष्ट एवं स्वस्थ विद्यार्थियों का निर्माण किया जाएगा।

मेरे इस विद्यालय में सभी के लिए प्रवेश सुलभ होगा। प्रवेश के लिए माता-पिता का किसी विशेष पद पर होना अनिवार्य नहीं होगा। विद्यालय में जाति, भाषा, धर्म, संप्रदाय जैसी बातों पर ध्यान नहीं दिया जाएगा। विद्यालय में रखा गया शुल्क भी कम से कम होगा जिससे कि सामान्य जनता भी अपने बच्चों का प्रवेश विद्यालय में करा सके।

विद्यालय में अनेक पाठ्येत्तर क्रिया-कलापों तथा सहगामी गतिविधियों के माध्यम से विद्यार्थियों में अनेकता में एकता तथा सांप्रदायिक सद्भाव जैसी भावनाओं का विकास किया जाएगा, जिनकी आज देश को नितांत आवश्यकता है। विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास को लक्ष्य में रखकर समस्त योजना बनाई जाएगी। इसके लिए आचार्यों तथा प्रधानाचार्य की कार्य-प्रणाली का इस प्रकार विकास किया जाएगा कि वह विद्यार्थियों के लिए प्रेरणास्पद बन सके। मेरे इस विद्यालय में बाह्य अनुशासन के स्थान पर आत्मानुशासन पर बल दिया जाएगा। इसके लिए मैंने कुछ प्रयोग सोच रखे हैं। एक है-परीक्षा के दिनों में परीक्षा कक्ष में छात्रों द्वारा अपने स्वयं के निरीक्षण में परीक्षा देना अर्थात् परीक्षा देते समय आचार्य लोग परीक्षा-कक्षों में नहीं जाएंगे।

मेरे सपनों के विद्यालय में विभिन्न प्रकार की सांस्कृतिक प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाएँगी तथा विद्यार्थियों को देश की ज्वलंत समस्याओं के प्रति जागरूक बनाया जाएगा। मैं मानता हूँ कि इतने आदर्शों की पूर्ति करने वाला विद्यालय कोई विरला ही होगा, परंतु यदि अवसर मिला, तो मैं ऐसे विद्यालय को स्थापित करने का पूरा प्रयास करूँगा।

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