यदि मैं विद्यालय का प्रधानाचार्य होता हिंदी निबंध | If I Was The Principal Essay In Hindi

यदि मैं विद्यालय का प्रधानाचार्य होता हिंदी निबंध | If I Was The Principal par nibandh | If I Was The Principal par nibandh in Hindi | यदि मैं विद्यालय का प्रधानाचार्य होता हिंदी निबंध | If I Was The Principal par Hindi Essay | Essay on If I Was The Principal in Hindi

यदि मैं विद्यालय का प्रधानाचार्य होता हिंदी निबंध | If I Was The Principal Essay In Hindi

मानव अत्यंत कल्पनाशील प्राणी है। प्रत्येक मनुष्य अनेक प्रकार की कल्पनाएँ किया करता है। कल्पना का जगत है भी अत्यंत रमणीय और मधुर। इन्हीं कल्पनाओं में विचरण करता हुआ वह अपने जीवन का लक्ष्य भी निर्धारित कर लेता है। अपने जीवन-लक्ष्य को लेकर चलना ही मानव-जीवन की सफलता का लक्षण है, क्योंकि एक बार लक्ष्य निर्धारण के बाद मनुष्य उसे प्राप्त करने के लिए प्रयास भी अवश्य करेगा और जब किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए गंभीरता से प्रयास किया जाएगा, तो वह प्राप्त भी होगा। जो व्यक्ति अपना लक्ष्य निर्धारित किए बिना जीवन-पथ पर अग्रसर होता है उसकी स्थिति दिशाहीन होकर इधर-उधर भटकने वाले पथिक के समान होती है।

मैंने भी अपने जीवन के बारे में एक सपना देखा है, एक सुनहरा सपना-विद्यालय के प्रधानाचार्य बनने का सपना। मैंने पिछले ही दिनों महर्षि अरविंद का विचार पढ़ा था-‘अध्यापक राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली होते हैं। वे संस्कार की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से उन्हें सींच-सींच कर महाप्राण शक्तियाँ बनाते हैं।’ आप सोच रहे होंगे कि ये विचार तो अध्यापक के बारे में हैं फिर मैंने अध्यापक बनने की अपेक्षा प्रधानाचार्य बनने का सपना क्यों देखा? मेरा यह विश्वास है कि विद्यालय के अध्यापक अपने कर्तव्य को भली-भाँति तभी पूरा कर सकते हैं जब उनका मार्गदर्शन करने, उन्हें प्रेरणा देने तथा उन्हें पग-पग पर उत्साहित करने के लिए कोई पथ-प्रदर्शक या प्रधानाचार्य हो। योग्य प्रधानाचार्य के अभाव में विद्यालय की समस्त गतिविधियाँ उसी प्रकार शिथिल पड़ जाती हैं जैसे किसी योग्य सेनापति के अभाव में सैनिकों की रणनीति।

आज जब मैं विद्यालयों में शिक्षण की दयनीय स्थिति को देखता हूँ, तो मुझे लगता है कि शिक्षा के नाम पर विद्यार्थियों से खिलवाड़ किया जा रहा है। शिक्षा एक पवित्र काम न रहकर एक व्यवसाय बन गया है। पब्लिक स्कूलों की बाढ़ आ गई है, पर उनमें दिखावे के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। अनेक प्रकार की फीस, डोनेशन तथा शुल्क वसूल कर अभिभावकों का शोषण तो किया ही जा रहा है, साथ ही कर्तव्य भावना से हीन शिक्षक वर्ग टयूशनों के द्वारा अच्छी खासी कमाई कर रहे हैं। आज जिसे देखिए वहीं शिक्षा की दुर्गति के बारे में बात करता नजर आता है। साधारण व्यक्ति से लेकर राजनीतिज्ञों तक सभी चाहते हैं कि शिक्षा में आमूल-चूल परिवर्तन किया जाए, परंतु वास्तव में किया कुछ नहीं जा रहा। इन सब कारणों ने मेरे मानस को आंदोलित किया तथा मैंने एक प्रधानाचार्य बनकर शिक्षा के क्षेत्र में कुछ करने की योजना बनाई।

प्रधानाचार्य बनने के बाद मुझे बहुत कुछ करना होगा जिसके लिए मानसिक रूप से मैंने स्वयं को तैयार कर रखा है। मैं अपने विद्यालय को अन्य विद्यालयों के लिए एक आदर्श बनाने का प्रयास करूंगा। सर्वप्रथम मैं चाहूँगा कि लीक से हटकर कुछ कर दिखाया जाए। अधिकांश अच्छे विद्यालयों में केवल उन्हीं विद्यार्थियों को प्रवेश मिलता है, जिनके अभिभावक उच्च पदों पर आसीन हैं अथवा लक्ष्मी के कृपापात्र हैं। मैं अपने विद्यालय में सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों को प्रवेश दूँगा। मेरा यह मानना है कि हर विद्यार्थी में प्रतिभा होती है। जरूरत है उस प्रतिभा को विकसित करने के लिए उचित परिस्थितियाँ प्रदान करने की।

मेरा विद्यालय सर्वधर्म समभाव का अच्छा उदाहरण होगा जिसमें नैतिक शिक्षा का प्रावधान होगा, परंतु उसका आधार कोई धर्म विशेष न होकर सभी धर्मों का निचोड़ होगा। बच्चों में नैतिक मूल्यों के विकास के लिए मैं हर संभव प्रयास करूंगा। मेरा यह भी प्रयास होगा कि हर मास अभिभावकों को विद्यालय में बुलाया जाए तथा उनसे छात्रों की समस्याओं का आदान-प्रदान किया जाए। मेरा यह मानना है कि आज की शिक्षा की दुर्गति में अभिभावकों का भी योगदान है। आज अधिकांश अभिभावक अपने बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान नहीं देते। या तो वे अपने काम-काज में, धनोपार्जन में इतना व्यस्त रहते हैं कि उनके पास अपने बच्चों से बात करने का समय ही नहीं है या फिर वे विद्यालय में प्रवेश दिलाकर या फिर एक-दो टयूटर रखकर अपने कर्तव्य की इति-श्री मान लेते हैं। मैं चाहूँगा कि मेरे विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों का विद्यालय के आचार्यों से नियमित संपर्क बना रहे तथा दोनों के सहयोग से शिक्षा के स्तर में सुधार हो।

परीक्षा प्रणाली में भी पर्याप्त सुधार की इच्छा रखता हूँ। आज की परीक्षा प्रणाली अत्यंत दोषपूर्ण है। इसमें छात्रों की योग्यता का सही मूल्यांकन नहीं होता। केवल रटे-रटाए प्रश्नों के उत्तर देकर रट्टू तोते अधिक अंक ले जाते हैं। परीक्षा में कौन-से प्रश्न पूछे गए हैं, यह भी किस्मत का खेल माना जाता है। मेरा प्रयास रहेगा कि प्रश्न-पत्रों का निर्माण इस प्रकार से किया जाए कि उसमें संपूर्ण पाठ्यक्रम पर आधारित ऐसे प्रश्न हों, जिनका उत्तर केवल वही विद्यार्थी दे सकें जिसने उसे अच्छी प्रकार से पढ़ा है, केवल चुने-चुनाए संभावित प्रश्न नहीं।

मैं अपने विद्यालय में खेल-कूदों को अनिवार्य कर दूंगा। मैं चाहूँगा कि मेरे विद्यालय का कोई विद्यार्थी शारीरिक रूप से दुर्बल न हो। इसके लिए मैं ‘योग’ विषय को सभी के लिए अनिवार्य कर दूँगा। समय-समय पर विभिन्न मनोवैज्ञानिक परीक्षण करवाकर मैं बालकों की अभिरुचि का पता लगवाकर, उन्हें भविष्य के लिए सही मार्ग दर्शन प्रदान करूंगा। इसी श्रृंखला में मैं समयसमय खेलों के विशेषज्ञों को बुलाकर बच्चों की खेल-कूद की प्रतिभा का पता लगवाकर उन्हें विभिन्न खेल-कूदों का प्रशिक्षण दिलवाऊंगा।

विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए हर विद्यार्थी को विभिन्न प्रतियोगिताओं, जैसे-भाषण, वाद-विवाद, क्विज़, नाटक, आदि में भाग लेना अनिवार्य होगा। समय-समय पर उन्हें देश के विभिन्न भागों की भ्रमण की योजना बनाकर मैं अपने विद्यालय के विद्यार्थियों को भारत की बहु-आयामी संस्कृति के दर्शन कराकर राष्ट्रीय एकता को पुष्ट करने का प्रयास करूंगा। मेरा यह प्रयास होगा कि मेरे विद्यालय से पढ़कर निकलने वाले विद्यार्थी अपने भावी जीवन में एक प्रबुद्ध, कर्मठ, संस्कारित तथा अनुशासित नागरिक बन सकें।

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