खेल-कूद का महत्व पर निबंध | Essay on Value of Games and Sports in Hindi

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खेल-कूद का महत्व पर निबंध | Essay on Value of Games and Sports in Hindi

भूमिका

एक बार कुछ नौजवान स्वामी विवेकानंद के पास आए और बोले, “स्वामी जी, आप हमें गीता समझाइए।” स्वामी जी ने उनसे कहा, “मेरे नवयुवक मित्रो! गीता के अभ्यास की अपेक्षा मैदान में जाकर फुटबाल खेलो। तुम्हारी कलाई और भुजाएँ अधिक मजबूत होने पर तुम गीता को अधिक अच्छी तरह समझ सकोगे। अपने रक्त में शक्ति की मात्रा बढ़ने पर तुम श्रीकृष्ण की महान प्रतिभा और अपार शक्ति को अधिक अच्छी तरह समझ सकोगे। बलवान बनो, तुमको मेरी यही सलाह है। शारीरिक दुर्बलता ही हमारे दुखों के कम से कम एक तृतीयांश का कारण है। … सर्वप्रथम हमारे नवयुवकों को बलवान बनना चाहिए। धर्म अपने आप पीछे आ जाएगा।”

स्वास्थ्य निर्माण

स्वामी विवेकानंद के इस कथन से स्पष्ट है कि शरीर का स्वस्थ रहना नितांत आवश्यक है। शरीरमायं खलु धर्म साधनम्’ कहकर हमारे आर्य-ग्रंथों में स्वस्थ शरीर को धर्म-साधन की पहली आवश्यकता माना गया है, इसीलिए व्यायाम और खेल दोनों ही हमारे स्वस्थ और सफल जीवन के अनिवार्य अंग हैं।

शारीरिक, मानसिक विकास

खेल हमारे शरीर और मन-मस्तिष्क का समुचित विकास करते हैं। खेलने से शरीर पुष्ट होता है। मांसपेशियाँ मजबूत बनती हैं; शरीर में समुचित गठाव आता है। शरीर की सभी इंद्रियाँ सक्रिय रहती हैं। रक्त का संचार उचित रूप से सारे शरीर में होता है। खुली हवा में खेलने से जो परिश्रम होता है उससे फेफड़ों में ऑक्सीजन अधिक मात्रा में जाती है। इससे फेफड़े ही नहीं, सारा शरीर नई शक्ति से भर जाता है। खुलकर भूख लगती है, जठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है और जो खाते हैं, पच जाता है। इससे नया रक्त बनता है। भाव यह है कि खेलकूद से शरीर की प्रत्येक क्रिया उचित प्रकार से होती रहती है। इससे रोग भी दूर रहते हैं। न खेलने से व्यक्ति को आलस्य, रोग, बुढ़ापा सभी कुछ तो घेर लेते हैं। भरी जवानी में ही व्यक्ति बूढ़ा-सा लगने लगता है। अस्वस्थ शरीर के कारण उसका मन भी बुझा-बुझा-सा रहता है। उमंग-उत्साह बहुत पीछे छूट जाते हैं। जीवन की खुशियाँ मुख मोड़ लेती हैं और ईश्वर-प्रदत्त प्रतिभाओं से युक्त होता हुआ भी व्यक्ति लाचार और हताश बनकर रह जाता है। धन-संपदा, आदर-मान सत्कार, पद सब कुछ होने पर भी अगर स्वास्थ्य साथ नहीं देता, तो सारा जीवन नीरस और व्यर्थ हो जाता है। रोगी व्यक्ति न केवल अपने लिए, बल्कि अपने परिवार के लिए भी बोझ-स्वरूप हो जाता है। वह समाज पर बोझ बनकर उसका अहित करता है। गाँधी जी तो बीमार होने को पाप का चिह्न मानते थे। अत: व्यापक हितों के लिए शरीर को स्वस्थ रखना बहुत आवश्यक है और उसका सीधा-सा सरल उपाय है-खेल कूद में पूरा-पूरा हिस्सा लेना।

मानवीय गुणों का विकास

खेल से मन-मस्तिष्क का भी विकास होता है। खेल के मैदान की मित्रता और भाईचारे का जवाब नहीं। खेल-भावना हमें जीत की खुशी और हार के दुख से ऊपर उठाकर समरसता की ओर ले जाती है। यही समरसता व्यक्ति को जीवन में समुन्नत और सफल बनाती है। खेल अनुशासन, संगठन, पारस्परिक सहयोग, साहस, विश्वास, आज्ञाकारिता, सहानुभूति, समरसता आदि गुणों का हममें विकास करके हमें देश का सभ्य तथा सुसंस्कृत नागरिक बनाते हैं। खेल हमारे अंदर निर्णय लेने की शक्ति का विकास करते हैं। ऐसा कौन-सा गुण है जो खेल से हमें प्राप्त नहीं होता? ‘वाटरलू’ की विजय का रहस्य समझाते हुए एक अंग्रेज ने कहा था कि, “विद्यार्थी जीवन में खेल की भावना से प्रशिक्षित होकर ही ‘एटन’ के मैदान में अंग्रेजों ने नेपोलियन को ‘वाटरलू’ के युद्ध में पराजित किया था।”

वर्तमान समय में खेल की आवश्यकता

आज के इस युग में तो खेलों का महत्त्व और भी अधिक बढ़ गया है। आज बहुत बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि संसार के विभिन्न देश अपने-अपने मतभेदों को भुलाकर प्रेम और शांति से रहें। खेल इसमें अपनी मुख्य भूमिका निभाते हैं। समय-समय पर आयोजित एशियाई खेल या यूरोपीय खेल या ओलंपिक खेलकूद का इस दृष्टि से बहुत महत्त्व है। सभी देशों के हजारों लोग आपस में मिल बैठते हैं। भाषा, रंग, जाति, धर्म आदि की संकीर्ण मर्यादाएँ यहाँ आकर टूट जाती हैं।

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