देशभक्ति पर निबन्ध | Essay on Patriotism in Hindi

देशभक्ति पर निबन्ध | Patriotism par nibandh | Patriotism par nibandh in Hindi | देशभक्ति पर निबन्ध | Patriotism par Hindi Essay | Essay on Patriotism in Hindi

देशभक्ति पर निबन्ध | Essay on Patriotism in Hindi

“जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं।
वह हृदय नहीं, वह पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।”

गुप्त जी ने सच ही कहा है-अगर हमें अपने देश के प्रति प्यार नहीं है, उसके हित पर सब कुछ न्योछावर करने की भावना नहीं है तो हमारा जीवन व्यर्थ है, हमारा हृदय पत्थर है। जन्म-भूमि, मातृभूमि की तो बात ही न्यारी है। जिसकी मिट्टी से हमारा शरीर बना है, जिसके अन्न-जल से हमारा पोषण हुआ है, उस मातृभूमि का ऋण हम एक बार तो क्या, सौ बार मर कर भी नहीं चुका सकते।

अपने देश के प्रति प्रेम और भक्ति मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। देश की जलवायु, वातावरण, प्राकृतिक साधन आदि चाहे कैसे भी क्यों न हों, व्यक्ति को अपने देश से प्यार होता ही है। भारत का ही नहीं, विश्व का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है कि वीरों ने देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों का हँसते-हँसते उत्सर्ग कर दिया।

कविवर माखनलाल चतुर्वेदी के फूल की तो अभिलाषा ही यही है कि:

“मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ में तुम देना फेंक।
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जाएँ वीर अनेक ।।”

देशभक्ति के उचित विकास के लिए आवश्यक है कि हम देश की महान परंपराओं को समझें, उसके वैभव के दर्शन करें। दूर-दूर तक फैले खेतों से, हरे-भरे मैदानों से, वनों से, कल-कल बहती सरिताओं से, गर्जना करते और चरण पखारते सागर से, श्वेत हिम-राशि से ढंकी पर्वत-मालाओं से हम घनिष्ठ संपर्क स्थापित करें; प्रदेशों के खान-पान, रीति-रिवाज, भाषा और परंपराओं का सम्यक ज्ञान प्राप्त करें। उसकी विशालता और वैभव को देखें-समझें, तभी सही अर्थों में देश के प्रति गहरा लगाव जाग्रत होगा।

देशभक्ति कोई अंधविश्वास, काल्पनिक सत्य या ऊपर से थोपी गई भावना है, यह तो हृदय का स्वाभाविक भाव या प्रवाह है। जिस प्रकार कोई पुत्र अपनी माता की रक्षा करता है, उसके मान-सम्मान का ध्यान रखता है, उसी प्रकार प्रत्येक देशवासी का कर्तव्य है कि वह देश की रक्षा, सुख-समृद्धि और विकास में अपना पूरा-पूरा सहयोग दे। सच्ची देशभक्ति यही है कि संकट काल में हम अपना तन, मन, धन और सर्वस्व देश के हित में अर्पण कर दें। जैसे मुझे अपना देश प्यारा है, उसी प्रकार औरों को भी अपना देश प्यारा है।

अगर कोई मेरे देश की स्वतंत्रता में बाधा डालता है तो मुझे बुरा लगता है, उसी प्रकार अगर मैं किसी की स्वतंत्रता में बाधा डालूँगा तो उसे बुरा लगेगा। इसीलिए देश-प्रेम का अर्थ दूसरे स्वतंत्र देशों से ईर्ष्या करना नहीं है। अपने देश को प्रेम करते हुए हम विश्व-प्रेम और मानव-प्रेम की सीमा तक ऊपर उठे-यही भावना सच्चे देश-प्रेम की भावना है।

देशभक्ति कोई संकुचित भावना नहीं है। यह तो ऐसी उदार भावना है, जिसमें जियो और जीने दो’ का भाव हमेशा जुड़ा रहता है। देशप्रेम पवित्र भाव है। यह देश को एकता के मजबूत सूत्र में बाँधता है। हम इसे अपने स्वार्थ की कालिमा से कलुषित न करें। धर्म, भाषा, जाति आदि के नाम पर इसे टुकड़ों में न बाँटें । प्रेम से सबको अपना बनाकर चलें। स्वयं विकास करें, दूसरों को भी विकास करने दें। स्वयं उठे, औरों को भी उठाएँ। सह-अस्तित्व के इसी आधार पर देशभक्ति को देखें, परखें और बरतें, तभी देश का और विश्व का कल्याण होगा।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *