मेरी प्रिय पुस्तक पर निबंध | Essay on My Favorite Book in Hindi

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मेरी प्रिय पुस्तक पर निबंध | Essay on My Favorite Book in Hindi

पुस्तकें ज्ञान का अथाह भंडार होती हैं। इनके पढ़ने से न केवल हमारा मनोरंजन होता है, अपितु ज्ञान का संवर्धन भी होता है। आज के युग में किसी भी भाषा में एक-से-एक अच्छी पुस्तकें सुलभ हैं। हिंदी भाषा में तो अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ उपलब्ध हैं। किसी भी पुस्तक की सार्थकता इस बात पर निर्भर करती है कि वह पाठकों को कितना प्रभावित करती है, वह कितनी लोकप्रिय है, वह मनोरंजन करने में कितना समर्थ है तथा वह अपने उद्देश्य में कहाँ तक सफल रही है एवं उससे पढ़ने वालों का कितना हित हुआ है। महाकवि तुलसीदास द्वारा प्रणीत ‘रामचरितमानस’ में ये सभी विशेषताएँ तथा गुण विद्यमान हैं, जिसके कारण इस ग्रंथ ने न केवल मुझे अपितु समूचे जनमानस को प्रभावित किया है। रामचरितमानस अनेक धार्मिक तथा साहित्यिक विद्वानों की प्रिय पुस्तक है।

रामचरितमानस की लोकप्रियता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज के घोर अनैतिक समय में भी शायद ही कोई हिंदू घर ऐसा हो, जिसमें रामचरितमानस की प्रति न हो। बड़े-बड़े महलों से लेकर निर्धन के झोंपड़ों तक में इस ग्रंथ के प्रति अपार श्रद्धा है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के पावन चरित्र को लेकर अवधी भाषा में रचा गया यह अमर काव्य अपनी कथा तथा शिल्प दोनों में ही अनूठा है। इस पुस्तक ने भारतीय संस्कृति की रक्षा की है तथा जनमानस को आंदोलित किया है।

तुलसीदास ने इस अमर काव्य की रचना ऐसे समय में की जब हिंदू जनमानस की बल्लरी सूख चुकी थी, हिंदू जनता अपना संपूर्ण पराक्रम एवं शौर्य खोकर दैन्य के तप्त झोंकों से त्रस्त होकर नैराश्यपूर्ण जीवन बिता रही थी। देश की सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक स्थिति विशृंखलित हो चुकी थी, पारस्परिक ईर्ष्या और द्वेष की खाई बढ़ती जा रही थी। तुलसीदास ने अपने समय की अनेक विचारधाराओं का समन्वय करके हिंदू समाज को एक नई दिशा प्रदान की।

रामचरितमानस की रचना आज से लगभग चार सौ वर्ष पूर्व हुई थी, परंतु आज भी यह ग्रंथ जन-जन के गले का हार है। इस ग्रंथ में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के लोकरक्षक चरित्र का वर्णन किया गया है। श्रीराम आदर्श भाई, आदर्श पुत्र, आदर्श पति, आदर्श मित्र तथा आदर्श राजा हैं। मानस के सभी पात्र अपने आप में एक आदर्श प्रस्तुत करते हैं-भरत और लक्ष्मण के रूप में भाई का आदर्श, हनुमान के रूप में सेवक का आदर्श, सीता के रूप में पत्नी का आदर्श प्रस्तुत किया गया है। रामचरितमानस के सभी चरित्रों के माध्यम से तुलसीदास ने किसी विशेष गुण और शुद्धाचरण की शिक्षा दी है। यह ग्रंथ भारतीय संस्कृति के उज्जवलतम मानवीय मूल्यों की प्रेरणा देने वाला अद्भुत ग्रंथ है।

रामचरितमानस की कथा सात कांडों में विभक्त है-बाल कांड, अयोध्या कांड, अरण्य कांड, किष्किंधा कांड, सुंदर कांड, लंका कांड और उत्तरकांड। बालकांड में श्रीराम जन्म तथा उनकी बाल्यावस्था, अयोध्याकांड में उनके विवाह, वनगमन तथा पिता की मृत्यु, अरण्यकांड में सीताहरण, किष्किंधाकांड में राम-सुग्रीव मित्रता और बालि-वध, सुंदरकांड में हनुमान जी की वीरता, लंका कांड में राम-रावण युद्ध तथा उत्तरकांड में ज्ञान, वैराग्य, राजनीति और धर्मनीति का चित्रण किया गया है।

यद्यपि महाकवि बाल्मीकि ने भी तुलसी से पूर्व बाल्मीकि रामायण में श्रीराम के जीवन का चित्रण किया था, परंतु उनका यह ग्रंथ संस्कृत में होने के कारण आज जनता तक नहीं पहुँच पाया। तुलसी ने इसी कथा को तत्कालीन अवधी भाषा में प्रस्तुत करके इसे जन-जन तक पहुँचाया। तुलसीदास ने रामचरितमानस में राम वनवास, भरत मिलाप, सीताहरण, लक्ष्मण को शक्ति लगने पर राम का विलाप जैसे मार्मिक प्रसंगों का वर्णन किया है।

रामचरितमानस भाषा, भाव, विषयवस्तु, काव्य सौंदर्य सभी दृष्टियों से अनूठा ग्रंथ है। इस ग्रंथ में सभी रसों का परिपाक हुआ है। राम का धनुभंग, लक्ष्मण-परशुराम संवाद, केवट-प्रसंग, अंगद-रावण संवाद, जैसे प्रसंग अनुपम हैं। इस ग्रंथ में अलंकारों का भी अत्यंत स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। भाव पक्ष की दृष्टि से मानस में भक्ति, ज्ञान और कर्म की त्रिवेणी प्रवाहित होती है।

रामचरितमानस की महानता के बारे में बेनी कवि ने ठीक ही कहा है

भारी भव सागर उतारतो कवन पार।
जो पै यह रामायण तुलसी न गावतो ॥

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