श्रम का महत्व पर निबंध | Essay on Importance of Labour in Hindi

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श्रम का महत्व पर निबंध | Essay on Importance of Labour in Hindi

संकेत बिंदु : 1. श्रम-आदर्श जीवन का मूल-मंत्र 2. उन्नति का आधार श्रम 3. सफलता पाने के लिए केवल इच्छा नहीं कर्मण्यता आवश्यक 4. देश को आगे बढ़ाने में श्रम का महत्व।

‘श्रम’ आदर्श जीवन का मूल मंत्र है। हमारे ऋषि-मुनियों ने, वेद-शास्त्रों ने-सभी ने एक स्वर से श्रम के महत्त्व को स्वीकार किया है। सच बात तो यह है कि श्रमशील व्यक्ति का अमृत-स्पर्श छोटे-से-छोटे कार्य को बड़ा एवं महान बना देता है।

सृष्टि के प्रारंभ से लेकर आज तक के इतिहास पर अगर हम नज़र दौड़ाएँ, तो हम पाएँगे कि मानव ने निरंतर परिश्रम करके ही अपने विकास का पथ प्रशस्त किया है। आज संसार में जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, वह उसके सतत परिश्रम का फल है। संसार के जितने भी उन्नत और समृद्धशाली देश हैं, उन सबके पीछे परिश्रम का ही आधार है। द्वितीय महायुद्ध ने जापान को लगभग तहसनहस कर दिया था। उसके दो बड़े औद्योगिक नगर हिरोशिमा और नागासाकी अणु बम की मार से खंडहर-मात्र रह गए थे, पर आज जापान विश्व का सबसे अधिक संपन्न देश है, क्यों ? इसका सिर्फ एक ही उत्तर है-उनके अपने सतत परिश्रम के कारण।

संसार के महान-से-महान व्यक्तियों ने अपना जीवन बहुत छोटे रूप से शुरू किया, लेकिन अथक परिश्रम करके वे उन्नति के चरम शिखर पर पहुँच गए। सत्य तो यह है कि संसार के बड़े और महान लोगों ने जीवन में छोटे-से-छोटा समझा जाने वाला कार्य भी पूरी लगन और श्रद्धा पे किया है। बोझा ढोने वाला कुली तेनजिंग ही संसार की सबसे ऊँची चोटी एवरेस्ट पर विजय-पताका फहरा सका है। सुभाषचंद्र बोस, अब्राहम लिंकन, लेनिन, गांधी और संसार के असंख्य लोग-निरंतर श्रम करके ही सफलता प्राप्त कर सके हैं।

किसी लेखक ने कहा है, “यदि तुम में उद्योगी बनने की क्षमता है, तो अपनी सारी शक्तियों को केंद्रित करके अपने उद्देश्य की पूर्ति में निरत हो जाओ, बाधाओं और विरोधों से भयभीत मत बनो। सफलता तुम्हारे चरण चूमेगी।” उद्यम करने से ही कार्य सफल होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं। सोते हुए सिंह के मुख में पशु स्वयं प्रवेश नहीं करते। कविवर मैथिलीशरण गुप्त ने कहा है:

“पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो, सफलता वर-तुल्य वरो, उठो।
अपुरुषार्थ भयंकर पाप है न उसमें यश है, न प्रताप है।”

आज हमारे चारों ओर अकर्मण्यता का बोलबाला है। कोई भी व्यक्ति काम करके खुश नहीं है। श्रम और श्रम के मूल्य को ताक पर रखकर हम ताश में, चौपड़ में, सोने में, गपशप में अपना समय नष्ट कर रहे हैं। श्रम का गुरुमंत्र पढ़कर अन्य देश न जाने कितने आगे निकल गए हैं और हम आज आजादी के इतने वर्षों बाद भी, गरीबी की सीमा रेखा के नीचे पड़े सिसक रहे हैं। हम गाल ही बजाते रहे और दुनिया वैभव की मीनार पर चढ़ गई।

पर आज भी इतना निराश होने की जरूरत नहीं है। जो बीत गया, उसे भूलकर यदि हम आज से ही परिश्रम करने का व्रत ले लें तो क्या नहीं हो सकता। धूल भरे वीरान रेगिस्तानों में लहलहाते खेत नज़र आएँगे; चिमनियों से उठते हुए धुएँ से और मेहनतकश इंसानों के उल्लासमय शोर से गरीबी सात समुंदर पार भाग जाएगी।

हमें सदा याद रखना चाहिए कि श्रम ही जीवन है। उन्नति और विकास रास्ता श्रम से होकर जाता है। देश को आगे बढ़ाने में एकमात्र श्रम ही सार्थक है।

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