दया धर्म का मूल है निबंध | Dya Dharam ka Mool Hai Essay in Hindi

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दया धर्म का मूल है निबंध | Dya Dharam ka Mool Hai Essay in Hindi

दया का भाव एक सहज स्वाभाविक वृत्ति है जो किसी भी व्यक्ति के हृदय में उत्पन्न हो सकती है। दया ही मनुष्य को पवित्र व ईश्वर के करीब ले जाती है।

गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है :

“दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान ।
तुलसी दया न छोड़िए, जब लगि घट में प्राण॥”

हमें अपने शरीर में प्राण रहने तक दयाभाव को त्यागना नहीं चाहिए। किसी दुखी को देखकर उसका दुख दूर करने की कोशिश करना ही धर्म है।

संसार का प्रत्येक धर्म दया और करुणा का पाठ पढ़ाता है। गौतम बुद्ध, महावीर, श्रीकृष्ण, जीसस, गुरु नानक-इन सभी ने

अपने-अपने धर्म में दया व करुणा के भाव को श्रेष्ठ बताया है।

परोपकार की भावना ही सबसे बड़ी मनुष्यता है। यह एक सात्विक भाव है। परोपकार करनेवाला न तो अपने-पराए का भेदभाव रखता है और न ही अपनी हानि की परवाह करता है। दया नि:स्वार्थ होती है। जिस दया के पीछे कोई स्वार्थ छिपा होता है, वह व्यापार ही होता है। दया व परोपकार के प्रवाह में मनुष्य की सारी कलुषिता तथा विकृतियाँ नष्ट हो जाती हैं।

संसार में जितने भी महान इनसान हुए हैं, सबके जीवन में करुणा का अंश अवश्य रहा है। भगवान बुद्ध ने राजपाट छोड़कर दुखी लोगों का दुख दूर करने में अपना जीवन लगा दिया। गुरु नानक ने सांसारिकता त्यागकर ही महानता को प्राप्त किया। गांधी जी ने अपनी वकालत त्यागकर देश को स्वतंत्र कराने के लिए लड़ाई छेड़ दी। जीसस ने अपने प्राणों की आहुति जनहित के लिए ही दी। विवेकानंद, रवींद्रनाथ ठाकुर और न जाने ऐसे कितने ही संत हुए, जिन्होंने अपनी दया भावना से मानव जाति के कल्याण की कामना करते हुए कर्म किए। मदर टेरेसा तो गरीब, असहाय लोगों के लिए दया की प्रतिमूर्ति थीं।

भगवान ने करुणा व दया की भावना मनुष्य को इसलिए दी है ताकि यह संसार बना रहे । न्याय व धर्म की रक्षा करना सदा से मानवीय धर्म है। दयाभाव विहीन मनुष्य भी पशु समान ही होता है। हृदय में उत्पन्न दयाभाव को स्वयं की स्वार्थ सिद्धि हेतु परिवर्तित करने की कामना से अधिक दुःखमय और दयनीय कुछ नहीं है। धर्म का मर्म ही दया है। दया भाव से ही धर्म का दीपक सदैव प्रज्ज्वलित रहता है।

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