बिना बिचारे जो करे सो पाछे पछताय निबंध | Bina Vichare Jo Kare So Pache Pachtaye

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बिना बिचारे जो करे सो पाछे पछताय निबंध | Bina Vichare Jo Kare So Pache Pachtaye

कवि गिरिधर ने ठीक ही कहा है :

“बिना विचारे जो करै, सो पाछे पछताय।
काम बिगारे आपना, जग में होत हँसाय॥”

किसी ने ठीक ही कहा है-‘जिसमें केवल गुण ही गुण हों-वह भगवान; जिसमें गुण अधिक, दोष कम-वह देवता; जिसमें गुण और दोष समान-वह मानव और जिसमें गुण कम और दोष अधिक-वह राक्षस कहलाता है।’ इस कथन से यह भली-भाँति स्पष्ट है कि कोई भी व्यक्ति पूर्णता का दावा नहीं कर सकता। मानव गुण-दोष का पुतला है। एक ओर उसमें जहाँ वीरता, दृढ़ता, ‘सत्यनिष्ठा, सदाचार, साहस, धैर्य, सहिष्णुता, विनम्रता, दया, परोपकार जैसे गुण हो सकते हैं, वहीं ईर्ष्या, द्वेष, कटुता, कायरता, घृणा, क्रोध, अहंकार आदि अनेक दोष भी उत्पन्न हो सकते हैं।

मानव का मन अत्यंत चंचल होता है। मानव अपने मन की इसी चंचलता के कारण अनेक बार सत्य से विचलित हो जाता है और अनेक प्रकार की बुराइयों में फंस जाता है। यदि देखा जाए तो मानव मन सदा संघर्ष में उलझा रहता है। एक ओर उसकी आत्मा उसे अच्छाई की ओर प्रवृत्त करती है, तो दूसरी ओर उसकी आसुरी वृत्तियाँ उसे बुराइयों की ओर । सत-असत, धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य आदि का संघर्ष चलता रहता है। यदि उसने आसुरी वृत्तियों का पल्ला पकड़ लिया, तो वह निरंतर पतन की ओर अग्रसर होता जाता है और यदि उसने दृढ़ता से इन आसुरी वृत्तियों पर नियंत्रण पा लिया, तो वह जीवन में निरंतर उन्नति की ओर बढ़ता जाता है।

मानव-विवेक ही उसे सुख-शांति के द्वार तक ले जाता है। इसीलिए ठीक ही कहा गया है — जहाँ सुमति तह सम्मति नाना, जहाँ कुमति तहँ विपत्ति निदाना। मानव की सुबुद्धि यदि उसकी उन्नति का कारण बनती है, तो उसकी दुर्बुद्धि उसके पतन का कारण बनती है। मानव के पास बुद्धि का अपार भंडार है। अपने बुद्धि-बल कारण ही वह अन्य चराचरों से श्रेष्ठ है। आहार, निद्रा, भय और मैथुन तो पशुओं में भी पाया जाता है। पशु-वर्ग से यदि मानव श्रेष्ठ है, तो केवल बुद्धि-बल के कारण। अपने बुद्धि चातुर्य के कारण ही आज के मानव ने प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ली है और कल तक असंभव समझे जाने वाले कार्यों को संभव कर दिखाया है।

कभी-कभी मानव अविवेक के कारण ऐसे कार्य कर बैठता है, जिनके कारण उसे जीवन भर पछताना पड़ता है। पश्चाताप की यह अग्नि उसे जलाती रहती है और वह जलने के सिवाय कुछ नहीं कर पाता। बिना विचारे कार्य करने वाला मनुष्य बाद में सिर धुनधुन कर पछताता है, परंतु इस पश्चाताप से कोई लाभ नहीं होता। किसी ने ठीक ही कहा है — हाथ का चूका फिर मारे, बात का चूका सिर मारै। जीवन का कोई भी क्षेत्र क्यों न हो मानव को विवेक, विचारशीलता, सुमति की नितांत आवश्यकता पड़ती है। कार्य प्रारंभ करने से पूर्व यदि सोच-समझकर निर्णय नहीं लिया गया, तो बाद में हाथ मलने के सिवाय कुछ नहीं बचता — ‘का वर्षा जब कृषि सुखाने, समय चूकि पुनि का पछताने’।

उचित समय पर उचित निर्णय करना ही मानव का परम कर्तव्य है। विचारपूर्वक आगे बढ़ना ही सफलता का मूल मंत्र है। इतिहास ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है, जब बिना सोचे-समझे किए गए कार्यों का परिणाम इतना भयंकर निकला कि सदियों तक पश्चाताप की अग्नि में जलने के सिवा कोई चारा नहीं रहा। कैकेयी जीवन भर पश्चाताप की अग्नि में जलती रही। रावण जैसे महापंडित, प्रतापी, शिवभक्त राजा का अविवेक उसके समस्त परिवार के विनाश का कारण बना । अत: व्यक्ति को सोच-समझकर कार्य करने चाहिए। बिना विचारे कार्य करने का परिणाम अमंगलकारी होता है।

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