अलंकार – अलंकार की परिभाषा, भेद, उदाहरण | Alankar Kise Kahate Hain

इस लेख में हम आपको अलंकार की परिभाषा (Alankar ki paribhasa) (Alankar kise kahate hain), अलंकार के भेद (Alankar ke bhed) और Alankar के उदाहरण के बारे में बताने वाले हैं। इस Article में अलंकार के बारे में पूरी जानकारी दी गई है। इसको ध्यान से पढे।

अलंकार - अलंकार की परिभाषा, भेद, उदाहरण | Alankar Kise Kahate Hain

अलंकार किसे कहते हैं? (Figure of Speech)

अलंकार में ‘अलम्’ और ‘कार’ दो शब्द हैं। अलम्’ का अर्थ है-भूषण, सजावट। अर्थात् जो अलंकृत या भूषित करे, वह अलंकार है। स्त्रियाँ अपने साज-शृंगार के लिए आभूषणों का प्रयोग करती हैं, अतएव आभूषण अलंकार’ कहलाते हैं।  ठीक इसी प्रकार कविता-कामिनी अपने शृंगार और सजावट के लिए जिन तत्वों का उपयोग-प्रयोग करती हैं, वे अलंकार कहलाते हैं।

वस्तुतः अलंकार वाणी के श्रृंगार हैं। इनके द्वारा अभिव्यक्ति में स्पष्टता, प्रभावोत्पादकता और चमत्कार आ जाता है। उदाहरण के लिए निम्नलिखित वाक्यों को देखिए :

  1. (क) राकेश की चाँदनी यमुना के जल पर चमक रही थी।
    (ख) चारु चंद्र की पल चाँदनी मक रही यमुना जल पर।
  2. (क) उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
    (ख) सावन के बादलों-सी उसकी आँखें बरसने लगीं।
  3. (क) पति को छोड़कर और कोई वरदान ले लो।
    (ख) वर को छोड़ और वर ले लो।

भाषा और साहित्य का सारा कार्य-व्यापार शब्द और अर्थ पर ही निर्भर है; अतएव विशिष्ट शब्द-चमत्कार अथवा अर्थ-वैशिष्ट्य ही कथन के सौंदर्य की अभिवृद्धि करता है। इसी आधार पर अलंकार के दो भेद किए गए हैं :

  1. शब्दालंकार
  2. अर्थालंकार।

1. शब्दालंकार —

जहाँ किसी कथन में विशिष्ट शब्द-प्रयोग के कारण चमत्कार अथवा सौंदर्य आ जाता है, वहाँ शब्दालंकार‘ होता है। शब्द को बदलकर उसके स्थान पर उसका पर्याय रख देने पर यह चमत्कार समाप्त हो जाता है; जैसे —

वह बाँसुरी की धुनि कानि परै, कुल-कानि हियो तजि भाजति है।

उपर्युक्त काव्य-पंक्तियों में कानि शब्द दो बार आया है। पहले शब्द कानि का अर्थ है कान और दूसरे शब्द कानि का अर्थ है मर्यादा। इस प्रकार एक ही शब्द दो अलग-अलग अर्थ देकर चमत्कार उत्पन्न कर रहा है। इस प्रकार का शब्द प्रयोग ‘शब्दालंकार‘ कहलाता है। यदि कुल कानि के स्थान पर ‘कुल मर्यादा’ या ‘कुल-मान’ प्रयोग कर दिया जाए तो वैसा चमत्कार नहीं आ पाएगा।

2. अर्थालंकार —

जहाँ कथन-विशेष में सौंदर्य अथवा चमत्कार विशिष्ट शब्द-प्रयोग पर आश्रित न होकर अर्थ की विशिष्टता के कारण आया हो, वहाँ अर्थालंकार होता है; जैसे — ‘मखमल के झूल पड़े हाथी-सा टीला’

इस काव्य-पंक्ति में वसंत के आगमन पर उसकी सज-धज और शोभा की सादृश्यता किसी महंत की सवारी के साथ करते हुए चमत्कार उत्पन्न किया गया है। यहाँ अर्थालंकार के एक प्रमुख भेद उपमा का सौंदर्य है जिसके बारे में विस्तार से आगे विचार किया जाएगा।

प्रमुख शब्दालंकार आधार पर अलंकार के भेद

  1. अनुप्रास अलंकार
  2. यमक अलंकार
  3. श्लेष अलंकार।

1. अनुप्रास अलंकार (Anupras Alankar)

जहाँ वर्णों की आवृत्ति से चमत्कार उत्पन्न हो, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।

उदाहरण:

  • कानन कुंडल मोर पखा, उर पे नमाल बिराजति है।

— इस काव्य-पंक्ति में ‘क’ वर्ण की तीन बार और ‘ब’ वर्ण की दो बार आवृत्ति होने से चमत्कार आ गया है।

  • छोरटी है गोरटी या चोरटी अहीर की।

— इस पंक्ति में अंतिम वर्ण ‘ट’ की एक से अधिक बार आवृत्ति होने से चमत्कार आ गया है।

  • सुरभित सुंदर सुखद सुमन तुम पर खिलते हैं।

2. यमक अलंकार (Yamak Alankar)

जब एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आए और उसका अर्थ हर बार भिन्न हो तो वहाँ यमक अलंकार होता है।

उदाहरण:

  • कहै कवि बेनी, बेनी ब्याल की चुराई लीनी,

— पहली पंक्ति में बेनी शब्द की आवृत्ति दो बार हुई है। पहली बार प्रयुक्त शब्द ‘बेनी‘ कवि का नाम है तथा दूसरी बार प्रयुक्त ‘बेनी‘ का अर्थ है ‘चोटी’।

  • काली घटा का घमंड घटा, नभ मंडल तारक वृंद खिले।

— काली घटा का घमंड घट गया है। घटा शब्द के दो विभिन्न अर्थ हैं — घटा = ‘काले बादल’ और घटा = ‘कम हो गया। घटा शब्द ने इस पंक्ति में सौंदर्य उत्पन्न कर दिया है। यह ‘यमक’ का सौंदर्य है।

3. श्लेष अलंकार (Salesh Alankar)

‘श्लेष’ का अर्थ है ‘चिपकना’ । जहाँ एक शब्द एक ही बार प्रयुक्त होने पर दो अर्थ दे वहाँ श्लेष अलंकार होता है। दूसरे शब्दों में, जहाँ एक ही शब्द से दो अर्थ चिपके हों वहाँ श्लेष अलंकार होता है।

उदाहरणः

  • चरन धरत चिता करत, चितवत चहुँ ओर।
    सुबरन को ढूँढ़त फिरत, कवि, व्यभिचारी, चोर ।

— उपर्युक्त दोहे की दूसरी पंक्ति में सुबरन का प्रयोग किया गया है जिसे कवि, व्यभिचारी और चोर — तीनों ढूँढ़ रहे हैं । इस प्रकार एक शब्द सुबरन के यहाँ तीन अर्थ हैं : (क) कवि सुबरन अर्थात् अच्छे शब्द; (ख) व्यभिचारी सुबरन अर्थात अच्छा रूप-रंग और (ग) चोर भी सुबरन अर्थात् स्वर्ण ढूँढ़ रहा है। अतः यहाँ श्लेष अलंकार है।

प्रमुख अर्थालंकार आधार पर अलंकार के भेद

  1. उपमा अलंकार
  2. रूपक अलंकार
  3. उत्प्रेक्षा अलंकार
  4. मानवीकरण अलंकार
  5. अतिशयोक्ति अलंकार।

1. उपमा अलंकार (Upma Alankar)

अत्यंत सादृश्य के कारण सर्वथा भिन्न होते हुए भी जहाँ एक वस्तु या प्राणी की तुलना दूसरी प्रसिद्ध वस्तु या प्राणी से की जाती है, वहाँ उपमा अलंकार होता है।

दो पक्षों की तुलना करते समय उपमा के निम्नलिखित चार तत्वों को ध्यान में रखा जाता है :

(क) उपमेय — जिसको उपमा दी जाए अर्थात् जिसका वर्णन हो रहा है, उसे उपमेय या प्रस्तुत कहते हैं। ‘चाँद-सा सुंदर मुख’ इस उदाहरण में ‘मुख’ उपमेय है।

(ख) उपमान — वह प्रसिद्ध वस्तु या प्राणी जिससे उपमेय की तुलना की जाए, उपमान कहलाता है। उसे अप्रस्तुत भी कहते हैं। ऊपर के उदाहरण में ‘चाँद’ उपमान है।

(ग) साधारण धर्म — उपमेय और उपमान का परस्पर समान गुण या विशेषता व्यक्त करने वाले शब्द साधारण धर्म कहलाते हैं। इस उदाहरण में ‘सुंदर’ साधारण धर्म को बता रहा है।

(घ) वाचक शब्द — जिन शब्दों की सहायता से उपमा अलंकार की पहचान होती है। सा, सी, तुल्य, सम, जैसा, ज्यों, सरिस, के समान-आदि शब्द वाचक शब्द कहलाते हैं।

यदि ये चारों तत्व उपस्थित हों तो पूर्णोपमा होती है, परंतु कई बार इनमें से एक या दो लुप्त भी हो जाते हैं, तब लुप्तोपमा कहते हैं। अब निम्नलिखित उदाहरणों से उपमा अलंकार को समझिए :

उदाहरण

  • ‘मखमल के झूल पड़े, हाथी-सा टीला’।

— उपर्युक्त काव्य-पंक्ति में टीला उपमेय है, मखमल के झूल पड़े हाथी उपमान है, सा वाचक है; किंतु इसमें साधारण धर्म नहीं है। वह छिपा हुआ है। कवि का आशय है-‘मखमल के झुल पड़े ‘विशाल’ हाथी-सा टीला।’ यहाँ विशाल जैसा का सामान लुप्त है; अतएव इस प्रकार की उपमा का प्रयोग लुप्तोपमा अलंकार कहलाता है।

  • ‘प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे’।

— उपर्युक्त काव्य-पंक्ति में प्रात:कालीन नभ उपमेय है. शंख उपमान है, नीला साधारण धर्म है और जैसे वाचक रस) यहाँ उपमा के चारों अंग उपस्थित हैं; अतएव यहाँ पूर्णोपमा अलंकार है।

2. रूपक अलंकार

जहाँ गुण की अत्यंत समानता के कारण उपमेय में ही उपमान का भेद आरोप कर दिया गया हो, वहाँ रूपक अलंकार होता है।

उदाहरण:

  • उदित उदयगिरि-मंच पर, रघुवर बाल-पतंग
    विकसे संत-सरोज सब, हरषे लोचन-भंग

— प्रस्तुत दोहे में उदयगिरि पर ‘मंच’ का, रघुवर पर ‘बाल-पतंग’ (सूर्य) का, संतों पर ‘सरोज‘ का एवं लोचना (औरों) का अभेद आरोप होने से रूपक अलंकार है।

3. उत्प्रेक्षा अलंकार

जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना अथवा कल्पना कर ली गई हो, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। इसके बोधक शब्द हैं : मनो, मानो, मनु, मनहु, जानो, जनु, जनहु, ज्यों आदि।

उदाहरण:

  • मानो माई घनघन अंतर दामिनि ।
    घन दामिनि दामिनि घन अंतर, सोभित हरि-ब्रज भामिनि॥

— उपर्युक्त काव्य –पंक्तियों में रासलीला का सुंदर दृश्य दिखाया गया है। रास के समय हर गोपी को लगता था कि कृष्ण उसके पास नृत्य कर रहे हैं । गोरी गोपियाँ और श्यामवर्ण कृष्ण मंडलाकार नाचते हुए ऐसे लगते हैं मानो बादल और बिजली, बिजली और बादल साथ-साथ शोभायमान हो रहे हों। यहाँ गोपिकाओं में बिजली की और कृष्णा में बादल की संभावना की गई है। अतः उत्प्रेक्षा अलंकार है।

4. मानवीकरण अलंकार

जहाँ जड़ पर चेतन का आरोप अर्थात् जड़ प्रकृति पर मानवीय भावनाओं तथा क्रियाओं का आरोप हो, वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है।

  • बीती विभावरी जाग री।
    अंबर पनघट में डुबो रही तारा घट उषा नागरी।

‘उषा’ पर ‘नागरी’ का आरोप होने के कारण मानवीकरण अलंकार है।

5. अतिशयोक्ति अलंकार

जहाँ किसी वस्तु, पदार्थ अथवा कथन (उपमेय) का वर्णन लोक-सीमा से बढ़ाकर प्रस्तुत किया जाए, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।

उदाहरण:

  • भूप सहस दस एकहिं बारा। लगे उठावन टरत न टारा।।

— धनुर्भंग के समय दस हजार राजा एक साथ ही उस धनुष (शिव-धनुष) को उठाने लगे, पर वह तनिक भी अपनी जगह से नहीं

हिला। यहाँ लोक-सीमा से अधिक बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया गया है, अतएव अतिशयोक्ति अलंकार है।

प्रमुख अलंकारों में अंतर

(क) यमक और श्लेष —

यमक अलंकार में एक शब्द अनेक बार प्रयुक्त होता है और हर बार उसका अर्थ भिन्न होता है, लेकिन श्लेष में शब्द एक बार ही प्रयुक्त होता है लेकिन उसके विभिन्न अर्थ निकलते हैं; जैसे —

यमक — कनक कनक तै सौगुनी, मादकता अधिकाय।
वा खाए बौराय जग, या पाए बौराय॥

— यहाँ कनक शब्द दो बार दोहराया गया है। लेकिन दोनों बार अर्थ भिन्न-भिन्न हैं । इसका एक जगह अर्थ निकलता है ‘सोना ‘और दूसरी जगह ‘धतूरा‘।

श्लेष — रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती मानुस चून॥

— यहाँ पानी शब्द में श्लेष है। पानी का अर्थ मोती के संदर्भ में चमक, मानुस के संदर्भ में इज्जत तथा चून के संदर्भ में जल है।

(ख) उपमा और रूपक —

उपमा में उपमेय और उपमान में समानता दिखाई देती है, जबकि रूपक में उपमेय तथा उपमान एक मान लिया जाता है; जैसे —

  • मुख चंद्रमा के समान सुंदर है।
    उपमा [उपमेय (मुख) और उपमान (चंद्रमा) में समानता]
  • मुख चंद्रमा है।
    रूपक [उपमेय और उपमान एक समान]
(ग) उपमा और उत्प्रेक्षा —

उपमा में उपमेय और उपमान में समानता दिखाई देती है, जबकि उत्प्रेक्षा में उपमेय में उपमान की संभावना की कल्पना की जाती है; जैसे—

  • मुख चंद्रमा के समान सुंदर है।
    — उपमा
  • मुख मानो चंद्रमा है।
    उत्प्रेक्षा [उपमेय (मुख) में उपमान (मानो) की कल्पना]

ध्यान देने योग्य

  1. अलंकार काव्य के सौंदर्य में अभिवृद्धि करते हैं।
  2. अलंकार के दो भेद हैं : — शब्दालंकार, अर्थालंकार।
  3. वर्णों की आवृत्ति अनुप्रास अलंकार’ कहलाती है।
  4. एक शब्द का भिन्न अर्थ में एक से अधिक बार प्रयोग ‘यमक अलंकार’ होता है।
  5. जहाँ एक शब्द एक ही बार प्रयुक्त हो, पर संदर्भ से भिन्न-भिन्न अर्थ दे, वहाँ श्लेष अलंकार’ होता है।
  6. अत्यंत सादृश्य के कारण एक वस्तु या प्राणी की तुलना, दूसरी प्रसिद्ध वस्तु या प्राणी से करने पर ‘उपमा अलंकार’ होता है।
  7. जहाँ अत्यंत समानता के कारण उपमेय पर उपमान का आरोप कर अभेद कर दिया जाए, वहाँ ‘रूपक अलंकार’ होता है।
  8. उपमेय में उपमान की संभावना ‘उत्प्रेक्षा अलंकार’ है।
  9. जहाँ जड़ पर चेतन का आरोप हो, वहाँ ‘मानवीकरण अलंकार’ होता है।
  10. जहाँ किसी वस्तु, पदार्थ अथवा कथन को बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जाए, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार’ होता है।

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